नवाचार

Generate my essay over time! Acquire records from your experienced company that promises papers article writing on just about any content. unique, Fast and cheap write my essay for me

जन सहयोग-


करीब १३ वर्ष पुरानी गौ शाला में निचले प्रबंधन के ठीस से काम नहीं करने से गौ वंश की मृत्युदर में इजाफा हो रहा था। जिस पर कई बार धरने प्रदर्शन हुए यह बात किसी से छुपी नहीं हें। बहरहाल इसके लिए शहर की ओर से कुछ पत्रकारों ने पहल की और इसमें जन सहयोग जोडऩे का अभियान शुरू हुआ। इसके लिए वॉट्सएप पर गौ सेवा का गु्रप बनाया गया। जिमसें पत्रकार, कर्मचारी, अफसर, वकील, डॉक्टर्स, समाज सेवी, व्यापारी एवं राजनीति से जुड़े लोग शामिल हुए करीब ४०० से अधिक लोगों ने जन्मदिन, विवाह आदि शुभ कार्य पर बीमार गौ वंश को गौ भोग लगाने के लिए डेट्स बुक करा रखी हें। जो तय डेट पर गौ शाला पहुंचकर गायोंं को गुड, चोकर, सब्जियां और फलों से गौ सेवा का कार्य करते हैं। इसके प्रचार प्रसार के लिए फेशबुक पेज गौ सेवा ग्वालियर को बनाया गया है जिसमें गौ शाला की गतिविधियों से लोगों को जोडऩे का काम जारी है।

संतों का प्रबंधन-


गौ शाला की व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए श्रीकृष्णायन देशी गौ रक्षा शाला के संत जो कि पूर्व में बन्हेरी गांव में एक लाख गायों के लिए गौ शाला का प्रकल्प शुरू कर रहे थे। उनसे आग्रह किया गया कि वह नगर निगम की गौ शाला का प्रबंधन का काम संभालें ताकि असमय हो रही गायों की मौत को रोका जा सके। इसके बाद संतों ने फरवरी माह से गौ शाला में प्रबंधन और सेवा का काम शुरू किया। इसके बाद कई निगम ने संतों के सुझाव पर कई नवाचार किए। जिससे नगर निगम का खिड़क समझी जाने वाली गौ शाला गौ धाम के रूम में तब्दील हो गई।

कबाड़ से विकास-


गौ शाला में बढ़ते गौ वंश को बचाने के लिए जरूरी था कि उन्हें अलग अलग भागों में बांटा जा सके। इसके लिए करीब दो करोड़ रुपए से अधिक का खर्चा बाउंड्री ब्लॉक बनाने पर होता। लेकिन संतों ने इसके लिए नगर निगम के कबाड़े का विकल्प सुझाया। जिस पर उन्होंने करीब १५ दिनों में ही सात नए ब्लॉक बनाए। जिससे अलग अलग ब्लॉक में, गाय, नंदी, बछिाया, दुधारू, बछड़े, बीमार और गर्भवती गायों के साथ ही दूसरी प्रजाति की गाय एवं अन्य पशुओं को रखने को अलग अलग रखा जा सका। इससे निगम के करीब दो करोड़ रुपए बच गए और निगम के कबाड़ का सही उपयोग करने का नया रास्ता भी खुल गया।

गोबर गैस प्लांट-


गायों के गोबर का उपयोग कर गौ शाला में संचालित होने वाले भंडारे आदि के कार्य के लिए गोबर गैस प्लांट का निर्माण किया गया। जिससे न केवल रसोई में ईधन की पूर्ति होती है वरन विद्युत की आपूर्ति भी की जा रही है। जिससे निगम के लाखों रुपए की बचत हो रही है।

लिफ्टिंग मशीन-


बीमार और घायल गायों को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाने के लिए ट्रेक्टर में ही हाईड्रोलिक सिस्टम से लिफ्टर लगाया गया है। इस प्रकार निगम ने करीब पांच लाख रुपए की बचत निगम के कबाड़ से ही वर्कशॉप द्वारा कर ली है।

मिक्सर टेंकर-


करीब ५ लाख रुपए की लागत से बनने वाले मिक्सर टेंकर को नगर निगम की वर्कशाप ने कबाड़ से ही तैयार कर दिया है।

काउ वॉकर-


दुघर्टना में घायल गायों को बचाने के लिए काउ वॉकर मशीन का निर्माण संतों की निगरानी में किया गया। इनसे गाय को खड़ी करने में मदद मिलती है। जिसे गायों की टांगों का उपचार संभव होता है और वह चलने फिरने योग्य हो जाती है।

 

फिनाइल का निर्माण-


गौशाला से उत्पन्न होने वाले गौ मूत्र से गौनाइल फि नाइल का निर्माण शुरू हो चुका है। इससे न केवल रोजगार के अवसर पैदा होंगे। बल्कि गौ शाला के आत्म निर्भर बनाने में बहुत मदद मिलेगी। इस गौ नाइल का प्रयोग नगर निगम के शौचालय, निगम भवन कार्यालय आदि में प्रथम चरण में होगा। इसके बाद दूसरे विभागों और प्राइवेट सेक्टर में भी सप्लाई करने की योजना पर काम जारी है। यह गौ नाइन २०० रुपए में पांच लीटर मिल रहा है जबकि दूसरे उत्पाद मंहगे हैं।

गोबर से लकड़ी-


फि लहाल गौबर से ईधन के लिए लकड़ीनुमा कंडों का निर्माण कार्य ऑनलाइन संस्था के साथ किया जा रहा है। यह संस्था शहर के मुक्तिधामों में कंडों की सप्लाई करेगी। इसमें मुनाफे की आधे की हिस्सेदारी गौ शाला को होगी। वहीं चिताओं में लकड़ी का उपयोग नहीं होने से शहर के हरे भरे वृक्षों को बचाने में भी मदद मिलेगी। जिससे शहर का वायु प्रदूषण कंट्रोल किया जा सकेगा।

गौ ग्रास का कलेक्शन-


शहर में लोगों को गौ शाला से जोडऩे के लिए गौ ग्राम अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत विशेष तौर पर साडा अध्यक्ष राकेश जादौन ने अभियान को लीड किया और एेसे लोग जो गायों को रोटी खिलाना चाहते हें वह प्रतिदिन की एक रोटी के हिसाब से साल की ३६५ रोटी के लिए करीब २१ किलो आटा गौ शाला को दान कर पुण्य कमा सकते हैं। उक्त अभियान के दौरान कई क्विंटल आटा गौ शाला को शहर से प्राप्त हो चुका है।

औषधालय-


गौ शाला में गौ आधारित चिकित्सा शुरू की जा चुकी है। यहां प्रति रविवार को पंचगव्य विशेषज्ञ गजेंद्र सिंह द्वारा ताकि शहर के लोगों व आस पास के गावों के लोगों को गौबर और गौ मूत्र आदि से बनी दवाओं से उपचार प्रदान कर रहे हैं। जिससे लोगों को गौ शाला से जोडऩे और गौ आधारित चिकित्सा से जोड़कर गौ वंश के संरक्षण का काम आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही गौ शाला की आय के नए रास्ते भी खुलेंगे।

ऑर्गेनिक खेती-


जैसे जैसे देश सहित पूरे विश्व में केंसर एवं अन्य घातक बीमारियों ने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। उसी तेजी से अब दुनियां में ऑग्रेनिक खेती की ओर लोग मुडऩे लगे हैं। जब आस पास के एरिया में खेती की जमीन को उपजाई और जहरीले रसायन मुक्त बनाने के लिए किसानों को जरूरत जिसे गौ शाला से जिले और संभाग स्तर पर आग्रेनिक खेती के लिए शुद्ध देशी गाय के गोबर से बने खाद को उपलब्ध कराया जा रहा है।

ध्यान केंद्र-


धार्मिक पर्यटन बढ़ाने के  लिए मंदिर परिसर में ही खंडहर की जगह को संतों ने जन सहयोग से आधुनिक ध्यानकेंद्र में विकसित कर दिया है। जहां शहर के लोग ध्यान ज्ञान के लिए पहुंच रहे हैं। भविष्य में पीतांबरा माई और मथुरा वृंदावन का विकल्प ग्वालियर गौधाम होगा।

निगम को सहयोग-


निगम के खाते में लोग सीधे दान की राशि जमा करके गौ शाला और गायों के संरक्षण के लिए सहयोग कर सकते हैं। इसके लिए आयुक्त नगर निगम के पंजाब नेशनल बैंक मुरार, के खाता संख्या.0329000100409258 पर राशि जमा करा सकते हैं।

गतिविधियां-


गौ शला से शहर के लोगों को जोडऩे और प्रचार प्रसार के लिए कई त्योहारों का आयोजन किया गया। जिसमें होली, गोपाष्टमी, दीपावली, श्रीकृष्णजन्माष्टमी पर विशेष आयोजन किए गए। इसके साथ ही कई बोद्धिक सत्रों का भी आयोजन किया गया। जिसमें शहर के युवा, पत्रकार, अधिवक्ताओं, स्कूल के विद्यार्थियों, कॉलेज के छांत्रों को गौवंश से जुड़ी जानकारियां प्रदान कर जागरुक किया गया। यह क्रम निरंतर जारी है।

भंडारा-


गौ शाला में जन सहयोग से प्रतिदिन करीब ३०० लोगों के लिए भोजन प्रसादी की व्यवस्था की जाती है। इसमें समाज के सहयोग से ही भोजन सामग्री का प्रबंधन होता है। पिछले करीब ९ माह से यह क्रम लगातार जारी है।

टैग सिस्टम-


गौ शाला में गायों की पहचान और जुर्माने के लिए टैग सिस्टम शुरू किया गया। शहर से आने वाली गायों को टैग लगाकार उनके फोटो खींचकर डिजिटल डाटा भी तैयार किया जा रहा है। ताकि कोई भी विवाद उठने पर उक्त तथ्यों से निराकरण किया जा सके।

धर्मकांटा-


गौ शाला में आने वाले भूसा चारा आदि की तौल में गड़बड़ी को रोकने के लिए जनभागीदारी से करीब पांच लाख में धर्मकांटा लगवाया गया। जिससे गौ शाला में आने वाले सामान की मौके पर ही तुलाई कर बिलों का भुगतान किया जाने लगा है।

आधुनिक थ्रेसर-


करीब ६ हजार गौ वंश के लिए चारे की कटाई में तेजी लाने के लिए पुरानी मशीनों की जगह आधुनिक थ्रेसर मशीन जनभागीदारी से लाई गई है। जो कुछ ही देर में टनों चारे को काट देती है।

भूसा घर-


मध्य प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा भूसाघर लाल टिपारा गौ शाला में बनाया गया है। करीब १० लाख से अधिक की लागत से बने भूसा घर का निर्माण भी संतों की प्रेरणा से जनभागीदारी से किया गया है। इतना ही नहीं इसे भरने के लिए आधुनिक मशीन का भी उपयोग हो रहा है।

सिरका टैंक-


नया भूसा गाय खा सके इसके लिए जरूरी हे कि उसमें गुड़ का सिरका मिलाया जाए। इसके लिए भी संतों की प्रेरणा से करीब दो लाख रुपए की लागत से टैंकर जनभागीदारी में लगवाया गया है।

पंखे कूलर आदि-


गर्मी से गौ वंश को बचाने के लिए गौ शला में करीब चार लाख रुपए की लागत से पंखे, कूलर, विद्युत लाइट का भी इंतजाम संतों की प्रेरणा से जनभागीदारी में हो सका है।

संगीत सिस्टम-


गौ वंश और गौ शाला को गौधाम रूपी माहौल में लाने के लिए संगीत की अहम भूमिका है। इसमें गायों को संगीत सुनाने के लिए साउंड सिस्टम भी जनभागीदारी से लगवाया गया है।

Our dissertation care usually requires down all the discomfort out of this. You might acquire a custom-made constructed dissertation steer for your email according to your advice essays for sale

essay writing online